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Thursday, March 7, 2019

मैं हूँ तो सिर्फ तुम्हारा ही!



मैं एक बार फिर लौटा तुम पे
बेतहासा सा और थोड़ा सा बेचैन सा भी
गाड़ियों का हॉर्न जैसे आज कुछ सुनाई ना दे रहा हो
जैसे तुम्हारे सिवा कहीं कुछ दिखाई ना दे रहा हो!
सर से निकलता पसीना जब गाल के पास से गुजरा
तो एक कंपकंपी सी महसूस हुई मुझे
कुछ उसी तरह जिस तरह महसूस की थी मैंने
तुम्हारे मुझे छोड़ जाने की बात पर
कितना अजीब है ना तुम्हारे मेरे बीच
कुछ दिन बात ना होना ही एक बात बन जाता है
वो बात कब बहस बन जाती है पता ही नहीं लगता
मगर जब मान कर तुम मेरे गले लगती हो ना
तुम्हारी साँसों को जब मैं महसूस करने लगता हूँ
और तुम्हारी धड़कनें मेरी धड़कनों संग जब अठखेलियाँ करने लगती हैं
सच कहता हूँ उस लम्हे पर सौ जनम कुर्बान हैं
मैं भरसक प्रयास करता हूँ उस लम्हे को रोक लेने को
तुम्हें अपनी बाहों में समेट लेने को
मगर अपनी टूटने की आदत से मजबूर
ये सब ख्वाब फिर एक बार टूट कर सा रह जाता है
जब ये बहस चुप्पी का नाम ले कर दरमियाँ आ ख़डी होती है
और अहसास दिलाती है की मुहब्बत छूट रही है
मैं चाह रहा था की तुम इस बेचैनी में थाम लो मेरा हाथ
और कहो की लौटा दोगी मेरा सुकून
जो तुम्हारे चंद लफ़्ज़ों में फंसा हुआ है कहीं
सुकून से सुकून के बारे में सोच पाऊं
इतनी भी तो फुर्सत नहीं दी इस कम्बख्त नौकरी ने
हाँ मगर यकीन करो जितना जी में आये टटोल लो मुझे
तुम्हारे सिवा मुझमें कुछ भी मिले तो कहना मुझे
क्यूँकि मैं हूँ तो सिर्फ तुम्हारा ही
हाँ कुछ झल्ला सा, कुछ सिरफिरा सा
कुछ नादान सा थोड़ा गुस्सैल भी
मगर जैसा भी हूँ मैं हूँ तो सिर्फ तुम्हारा ही!
तुम्हारा कमल


Sunday, February 24, 2019

बातें


इश्क़ करते हो
और नफा नुकसान की बातें करते हो!
अजीब शख्स हो
इंसान से भगवान की बातें करते हो !
ये कैसी सब है कि हर पल वीराना
मगर तुम बहार-ए -जान की बातें करते हो !
लगते तो बहुत समझदार से हो तुम
मगर इश्क़ नादान की बातें करते हो!
लौट गया वो डाकिया तुम्हारी देहलीज़ पर आ कर
तुम फ़िज़ूल ही दुनिया जहान की बातें करते हो !
कुछ गुलमोहर की खुशबुओं में है
तो कुछ सावन की पहली बारिश में
बताओ तुम किस मुस्कान की बातें करते हो!
महफ़िल में जाना, तनहा हो जाना
लौट कर घर को आना और फिर तारों को सताना
ये दिल ही दिल में किसके बखान की बातें करते हो !
जिससे भी मिलते हो नज़रें चुरा लेते हो
कहो तुम किससे दिल-ए-मेहमान की बातें करते हो !
एक अरसा हुआ कि हमने आइना ही नहीं देखा
एक अरसा हुआ की हमने तुमको ही नहीं देखा
सुना है तुम इश्क़ में इम्तेहान की बातें करते हो!
कि टूट कर भी नहीं टूटे तुम्हारे मेरे मुहब्बत के धागे ऐ कमल
कि तुम अब भी दो जिस्म एक जान की बातें करते हो !

- कमल पनेरू


Saturday, February 16, 2019

नया जख्म: पुलवामा



कुछ अनजान से थे कुछ बेख़बर से थे
अपने ठहाकों में ही खोये थे!
मालूम कहाँ था उनको कि आतंकियों ने
बीज कफ़न के बोये थे !
हुआ धमाका पुलवामा में फिर गगन पूरा हिला दिया
एक पल में ही खून उन जाबांजों का मिट्टी में फिर मिला दिया!
टुकड़ों में बिखरे उनके शव ने हिन्दुस्तां पूरा झकझोर दिया
मातृभूमि के रखवालों ने दम एक पल में ही तोड़ दिया!
इनकी वीरता को तिरंगे ने झुक कर सलाम किया!
ऐसी ओछी हरकत को जैस-ए-मुहम्मद ने अपना नाम दिया!
लोग मनाते रहे वैलेंटाइन पर उन्होंने खुद को कुर्बान किया !
चंद लम्हों में ही आदिल ने देश को श्मशान किया!
पक्ष हो या विपक्ष हो आपस में ना अब लड़ेंगे
हाँ सिध्धू जैसे नेता आतंकियों की भाषा जरूर पढ़ेंगे !
जख्म गहरा है पुलवामा का, सीने पर चोट खायी है!
मगर हिंदुस्तान हूँ, बदला लूंगा कसम मैंने खायी है!
आलोचक आये बड़े बड़े और करी सबने निंदा है
देखना है जैस-ए नपुंसक कितनी देर जिन्दा है!
मरे नहीं शहीद हुये हैं मेरे बेटे आँसू ना मैं बहाऊँगा
इन देश में पलते गद्दारों को मैं सबक जरूर सिखलाऊंगा
कफ़न नसीब हो ना इनको, ऐसी मौत मारूंगा
अरे हिन्दुस्तां हूँ मैं, अपनी नयी तस्वीर उतारूंगा!
पल भर में ही बदल दूंगा मैं सारी वो तक़दीर को
देखे जो कोई मुड़ कर मेरे इस कश्मीर को
बना नहीं वो बारूद अभी तक जो मिटाये हिन्दुस्तान को!
आओ मिल कर ख़तम करें इस झंझट पाकिस्तान को !

- कमल पनेरू






Monday, December 31, 2018

आखिरी तकलीफ

आज धड़कनो का शोर इतना तेज़ क्यों है मैं समझ नहीं पा रहा हूँ! क्या कहुँ  इसे? बेताबी? बेचैनी? या कोई तड़प? एक अर्से से खुद को इतना बेबस नहीं पाया था मैंने, मगर आज, साल के आखिरी दिन ऐसा लगता है मानो गम पहाड़ ही टूट पड़ा हो मुझपे! बाहर न्यू ईयर की  पार्टी का शोर है और उस शोर की चीरती हुई मेरी ख़ामोशी ने जैसे आज मेरी साँसों को बांध लिया हो! जैसे आज मैं ही मैं ना रहा! जैसे धुप ढलने के  सूरजमुखी सर झुका लेता है, कुछ यूँ ही शाम होते ही अपना सर छुपा लिया है मैंने  अपनी गोद में!
क्या मुझे इश्क़ समझ नहीं आता? या फिर दोश्ती निभाने में कोई कसार रख देता हूँ मैं? आज मानो लग रहा है की किसी मुझे निचोड़ दिया हो और बुरी तरह झंझोड़ दिया हो अंदर तलक!
आज तुम होती साथ तो लग के गले रो लेता  जी भर के मैं भी उन टूटे लोगों की तरह जिन्हें तकलीफ में एक कंधे की तलाश होती है! आज जैसे तन्हाई भी रूठी हुई हो मुझसे की इतना सूनापन मेरे अंदर छुपा है किसी रात के  अँधेरे में छुपे शहर की तरह! तुम आओ ना फिर से और निकाल दो ये डर मेरे मन से की तनहा हूँ मैं इस रात बहुत!  तुम्हारे एक तसल्ली देने भर से सब ठीक हो जाता है मेरा! मुझे उम्मीद दो ना कि मेरा नया साल अच्छा हो ठीक उसी तरह जैसे पल तुम्हारे साथ में अच्छे बीतते हैं मेरे ! 

Sunday, December 30, 2018

तकलीफ होती है


हाँ तकलीफ होती है
जब साल यूँ ही गुज़र जाता है
तो तकलीफ होती है
जब मेहनत कर के भी मायूसी हाथ  लगती है
तो तकलीफ होती है
जब सच्चे प्यार पर चलती है शक की कैंचियां
तो तकलीफ होती है
जब वफ़ा करने वाले भी खाने लगे धोखे
तो तकलीफ होती है!
दिन भर कमा कर भी सोये औलाद भूखी
तो तकलीफ होती है
की जमा किये सिक्कों से जब न ख़रीदा जाये कम्बल
और निकाली जाये रात कोहरे में ठिठुरते हुए
तो तकलीफ होती है
सुकून की बात करने वाला ही सुकून से न सो पाये
तो तकलीफ होती है
अक्सर बन जाते हैं बिगड़े हुए काम मगर
जब बने हुए काम बिगड़ने लगें
तो तकलीफ होती है
मानवता सबसे बड़ा धरम बोल कर
बांटें ज़माने को धर्मों की चौखट पर
तो तकलीफ होती है
नौकरी करता देख औलाद, बाप जीये शान से
फिर वही नौकरी दूरियाँ ले आये
तो तकलीफ होती है
नन्हों की मासूम सी हँसी  की  कायल दुनिया
फिर करे बलात्कार उन्ही बच्चों का
तो तकलीफ होती है
ऊपर वाला तो सब देख रहा चुपचाप
धरती पर जब इंसान मचाता उत्पात
तो तकलीफ होती है

 - कमल पनेरू


Sunday, November 11, 2018

ज़िन्दगी



बाप भरे होम लोन, बेटा घूमे बुलेट और कार में
अरे यही होता है क्या संसार में?
बाप चलाये सातों दिन दूकान बेटा जाये पांच दिन ड्यूटी
फिर सोये बेटा १२ बजे तक इतवार में
अरे यही होता है क्या संसार में ?
माँ लगाए घर में झाड़ू बहन धोये कपड़े बर्तन
बाप लाये शाम को खुशियाँ बेटा लाये टूटा तन
बस छपता है ये दिलों के अख़बार में
अरे यही होता है क्या संसार में ?
बहु के भी फिर खेल अनूठे
काम देख बदन उसका टूटे
मगर कोई कसर न छोड़े वो श्रृंगार में
अरे यही होता है क्या संसार में ?
बुखार में भी रहे अकेली मगर दर्द सबका पूछे
चीख चीख कर बोले माँ क्या यही होता है परिवार में?
परिवार बिखरता देख रोये बाप रातों में
सोचे बेटा बदला कैसे बहु से चंद मुलाकातों में
समझाए सबको कैसे की
खुशियाँ नहीं मिलती बाजार में
अरे यही होता है क्या संसार में ?
बूढ़ी दादी जपती राम नाम माला
बोले कलियुग का ये खेल निराला
राम नाम ना पूछे जब इंसान घूमे अहंकार में
अरे यही होता है क्या संसार में
बेटा बहु फिर हुकुम चलायें
रसोई भी फिर दो हो जायें
नहीं रहा दम अब बाप की पतवार में
अब यही होता है संसार में

- कमल पनेरू


Wednesday, October 17, 2018

When I Told

It was sunny evening and the cool breeze of mid October was giving sense of winters. In a hall of 40 x 80 I was filtering the keypad of my laptop to write on the screen. Meanwhile, I got an email that I have been promoted to manager. I could see that the mail was from higher authority of the organisation in which heads of all departments were in cc including HR. I was happy. I wanted to share this view best people that what goddess Durga had given me and what their blessing had offered me. Yes, my hard work was not enough for this position. It was blessings from parents and seniors as well.
I told to several close people and here are their reactions:
Director: I always know the potential of my employees.
Manager: You have long way to go.
COO: Congrats!
Mother: arey waah! arey sunte ho (on phone) humara ladka manager ban gaya!
Father: Kamyabi mubaraq ho!
Brother: Cool.
Girlfriend: Congrats! This is first step, and you will be CEO one day!
Friend 1: Badhai ho!
Friend 2: Ye to kamaal ho gaya!
Friend 3: Badiya hai
Friend 4: Navratri khatam hone de, daaru pilana fir.
Friend 5: You deserve this.
Friend 6: Salary bhi increase hui?
Friend 7: Chal kuch khate hain aaj bahar se
Friend 8: Good! If they know your potential, one day you would be joining them as partner.
Me: Thanks to all. Goodnight!